I am Haldwani the Gateway of Kumaon

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I am Haldwani the Gateway of Kumaon

I am Haldwani the Gateway of Kumaon लोग मुझे हल्द्वानी कहते है दुनिया के मैप में छोटा सा पर उत्तराखंड राज्य का एक बड़ा शहर।

मैं आपको अपनी कहानी सुनाता हूं जो किसी भी शहर की कहानी हो सकती है। वैसे शहर या गाँव सिर्फ कहानियाँ बनाते हैं और पीढ़ियों को बदलते हैं।

गोला नदी के किनारे पर आप आज जिस शहर को देख रहे हैं एक समय वहां हल्दू के पेड़ के घने जंगल थे और कई पक्षियों और जानवरों के लिए निवास था। अब वह जंगल पुरानी यादों में है, बुजुर्गों के शब्दों में और इतिहास की किताबों में हैं।

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Haldwani Railway Station

पेड़, पौधे, जंगल और जमीन और उन्हें काटने के लिए कोई प्रतिरोध नहीं करते हैं, समय के साथ जीवित रहने और दुनिया के साथ चलने के लिए मेरा स्वरुप बदलता रहा।

ऐसा मन जाता रहा है कि पेड़, पौधे, वन प्रगति रोजगार पैदा करने वाले उद्योगों, कारखानों, सड़कों, भवनों के निर्माण में बाधक हैं। जागरूक और समय के साथ चलने वाले इंसान अपने बुद्धि से इस वन संपदा को ख़त्म करना शुरू  किया और उनकी जगह बनने लगे सुविधाजनक और आरामदायक भवन  और उन तक पहुंचने के लिए आरामदायक सड़कें और तैयार हुवें कंक्रीट, लोहे, सीमेंट, रेत और इंसानो के जंगल।

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How i got my Name Haldwani

चौड़ी पत्ती वाले हल्दू वक्ष के वन यानी हल्दू फारेस्ट से मुझे ये नाम ब्रिटिश काल में  मिला। शहर के बीच अभी भी कुछ हल्दू के पेड़ हैं जो थोड़े टूटे हुए हैं, थोड़े अधूरे हैं और अपनों से छूटें हैं। हल्दू वृक्ष का वानस्पतिक नाम हल्दीना कोर्डिफ़ोलिया है।

यह इतिहास उतना ही पुराना हैं जितना पृथ्वी कुछ किताबों में दर्ज है, कुछ इससे पहले का लेकिन इस रूप में नहीं था मैं जैसा आज दिखता हूँ।

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Adina Cordifolia

My History

14 वीं शताब्दी में यह स्थान कुमाऊं साम्राज्य का हिस्सा बना चंद राजा ज्ञानचंद के शासन में।

बाद में मुगलों ने भी इस क्षेत्र पर नियंत्रण हासिल करना चाहा। लेकिन  पहाड़ियों से जुड़े इस क्षेत्र को जीतने के लिए कठिनाइयों के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ा।

16 वीं शताब्दी की शुरुआत में, यहाँ बुक्सा जनजाति यहां हुआ करती थी। फिर नेपाल के गोरखाओं ने इस क्षेत्र पर शासन किया। 1816 में अंग्रेजों ने गोरखाओं को हराया और इस पर अधिकार कर लिया। 1834 में जॉर्ज विलियम ट्रेल  कुमाऊं के आयुक्त बने और ब्रिटिश रिकॉर्ड के अनुसार 1834 में मेरा नाम हल्दू वन से हल्द्वानी किया गया। 

1883-84 में, रेलवे ट्रैक बरेली और काठगोदाम के बीच बिछाया गया। और 24 अप्रैल 1884 को वह दिन था जब पहली बार यहाँ ट्रैन पहुंची, वो ट्रैन लखनऊ से आयी थी।

1947 में देश की आज़ादी के समय यहाँ की जनसँख्या लगभग 25000 थी, धीरे-धीरे कुमाऊँ और अन्य हिस्सों से लोग यहाँ आने लगे, कृषि और कृषि आधारित व्यापारों के लिए आना शुरू किया व्यापार और आवाजाही बढ़ने से यहाँ की जनसँख्या बढ़ने लगी जो आज तक जारी है।

मुझे हर दिन अधिक भार उठाने की आदत हो गयी है और ये बोझ मुझ पे आज भी जारी है। मैंने पुरानी पीढ़ियों को जातें और नयी पीडियों को आतें, पालते और बढ़ते देखा है और उन्हें  यह कहते हुए सुना है कि शहर अब बहुत बदल गया है अब वो पुरानी बात नही। 

Lifestyle And Culture

यहाँ गाँव से कुछ लोग सपने ले के आतें है और यही के हो जातें है और यहाँ के लोग अच्छे जीवन और सपनो को पाने के लिए आगे बढ़ जातें है और निकल जातें है दिल्ली जैसे बड़े मेट्रो सिटी मे। वास्तव में हल्द्वानी, गाँव और दिल्ली जैसे बड़े सिटी के बीच लिंक का काम करता है।

लोग मुझे कुमाऊँ के सबसे बड़े शहर के रूप में भी  जानते हैं। मुझे कुमाऊँ का Gateway भी कहा जाता है। मैं देश के कई हिस्सों से सड़कों और रेलवे से अच्छी तरह जुड़ा हुआ हूँ और पंतनगर एयरपोर्ट से लगभग 26-27 किलोमीटर की दूरी पर हूँ। 

यहाँ उच्च अध्ययन के लिए कई प्रतिष्ठित गवर्नमेंट और निजी शिक्षण संस्थान हैं। मनोरंजन के लिए  मल्टीप्लेक्स और कुछ पारंपरिक थिएटर हैं, साथ ही चिकित्सा सुविधाओं के लिए कई सरकार और बहुत से प्राइवेट  मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल हैं।

कालाढूंगी चौराहा को सिटी का सेण्टर कहा जाता हैं और यहाँ शहर की चार मुख्य सड़कें मिलती है जो शहर को देश के अन्य सड़कों से कनेक्ट करती है। ये सड़कें है-

नैनीताल रोड

बरेली रोड

कालाढूंगी रोड

और रामपुर रोड

शहर के सबसे बड़ा बाजार कालाढूंगी चौराहे के पास हैं। इस बाजार में कई सड़कें हैं, यहां आपको  कपड़े, गहने, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक्स, और लगभग हर तरह की दुकानें मिल जाएँगी।

ऑटो कंपनियों के अधिकांश शोरूम बरेली रोड और रामपुर रोड में हैं। नैनीताल रोड को बड़े शोरूम, मॉल आदि  के लिए जाना जाता है। इनके अलावा, इन मुख्य राजमार्गों के बीच कई संपर्क मार्ग हैं, जो ले के जाती है शहर के मोहल्ले और गलियों मे।

Future of Haldwani

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Stadium

शहर का एक हिस्सा गोला नदी के दूसरी तरफ भी तेज़ी से बढ़ रहा है जिसे गोलापार हल्द्वानी कहा जाता है। यहाँ  एक अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम और चिड़ियाघर, हवाई अड्डा और राज्य बस टर्मिनल प्रस्तावित है।

मैं यहाँ बिना किसी भेदभाव के सभी के साथ सदभव के साथ रहता हूं। और यहां के लोग मेरे जैसे ही हैं, वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं, वे देश के लगभग सभी हिस्सों से हैं, सभी धर्मों के हैं और यहां प्रेम और एकजुटता के साथ रहते हैं।

यहां रहने वाले ज्यादातर लोग कुमाऊं क्षेत्र के लोग हैं। आज का हल्द्वानी यंग जनरेशन का हल्द्वानी है जो ओल्ड जनरेशन और यंग जनरेशन के बीच बैलेंस बनायें हुवे हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार यहाँ की जनसंख्या लगभग 1.6 लाख थी जो एक अनुमान के अनुसार अब लगभग 3 लाख से कुछ ज्यादा होगी।

करोड़ों लोग मुझसे कभी न कभी मुझसे गुजरें होंगे या कुछ पल यहाँ बिताये होंगे। मुझे पड़ने के लिए और मेरे साथ कुछ पल बिताने के लिए आपका धन्यवाद। 

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