Uttarakhand State Foundation Day: Uttarakhand Turns 21, Its Own Model Of Development Is Still Far Away – उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस: 21 बरस का हो गया उत्तराखंड, विकास का अपना मॉडल अब भी दूर

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Uttarakhand State Foundation Day: Uttarakhand Turns 21, Its Own Model Of Development Is Still Far Away – उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस: 21 बरस का हो गया उत्तराखंड, विकास का अपना मॉडल अब भी दूर

सार

राज्य में हर वर्ष किसी न किसी रूप में आपदाएं हमारे सम्मुख आ जाती हैं, हम उनसे निपटने में लग जाते हैं। समय गुजरता है और फिर हम इन्हें भूल जाते हैं।

विस्तार

नौ नंवबर को राज्य 21 साल का होने के साथ पूर्णरूप से वयस्क हो गया है। लेकिन इतने सालों में भी आपदा प्रबंधन और विकास के मॉडल पर राज्य की स्थिति चिंताजनक ही दिखती है। पर्वतीय राज्य होने के बावजूद विकास का टिकाऊ मॉडल हम आज तक विकसित नहीं कर पाए हैं। राज्य में हर वर्ष किसी न किसी रूप में आपदाएं हमारे सम्मुख आ जाती हैं, हम उनसे निपटने में लग जाते हैं। समय गुजरता है और फिर हम इन्हें भूल जाते हैं। जानकार बताते हैं कि पर्वतीय प्रदेश के विकास का मॉडल मैदान से कभी मेल नहीं खा सकता है। जबकि नीति-नियंताओं की ओर से लगातार मैदान का विकास मॉडल पहाड़ों पर थोपा जा रहा है।

खतरे को भांपने के बाद भी लगातार बनाई जा रहीं बड़ी परियोजनाएं

चौड़ी सड़कें, ऊंची-ऊंची इमारतें, नदियों के किनारे होटल, रिजॉर्ट, बड़ी परियोजनाएं खतरे को भांपने के बाद भी लगातार बनाई जा रही हैं। वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआईडीएम) की टीमों ने दो बार आपदाग्रस्त क्षेत्र का दौरा करने के साथ ही रिमोट सेंसिंग, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, राज्य आपदा न्यूनीकरण केंद्र और भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग जैसी विभिन्न विशेषज्ञ ऐजेंसियों के सहयोग से तीन चरणों में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। जिसमें केदारनाथ आपदा से सबक लेने के लिए 19 सिफारिशों का जिक्र किया गया था।

राज्य स्थापना दिवस: उत्तराखंड गठन के बाद सात जिलों में बढ़ा और छह में घटा वन आवरण

इस रिपोर्ट में जलविद्युत परियोजनाओं से जमीन धंसने, जल श्रोत सूखने और जन-जीवन प्रभावित होने के साथ ही वन्य-जीवन और पर्यावरण दूषित होने का जिक्र किया गया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में जलविद्युत परियोजनाओं के लिए पर्यावरण प्रभाव का आकलन बाध्यकारी होना चाहिए।

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